बवाल पर सवाल

यह जो हम बात बात पर मंदिर मस्जिद करते है
भगवान् चुप है पर हम धर्म का डंका बजाये फिरते है
यह लकीर जो कहती  है ब्रह्मण ऊपर दलित नीचे
यह लकीर जो ना जीवन और ना मौत ने खीचे
यह जो तेरा धर्म -मेरा धर्म, तेरी जाति – मेरी जाति  की होती रहती है खीच तान
बात बात पर रोष बात बात पर अभिमान
कितने झगड़े कितने बवाल
इन सब में है मेरे कुछ  सवाल
अगर हम सब है अपनी अपनी धर्म जाती के पूर्वजो के वंशज
फिर आदि मानव हमारे सबसे पहले पूर्वज
इनकी जाति धर्म का कैसे करे पता?
और कैसे करे पता की यह पहले बने इंसान या हिन्दू  और  मुसलमान ?
या फिर इंसान बनने से पहले जाति की खीच दी गयी थी लकीर !
क्या इन्होने  पहले सीखा हल जोतना या धर्मो के बीच एक खाई  खोदना ?
क्या ये जंगल जंगल भटकते हुए भी कुछ को दलित मान उन्हें सारी नदियों से रखते  थे दूर ?
क्या सबसे पहले आग से, पका खाना और हुई दूर ठंड
या दूसरो की गुफाओ को जलाने के लिए इसका हुआ था आविष्कार ?
एक बार सब कुछ चल जाये पता तो चैन आये
फिर मैं भी धर्म जाति का यह खेल खेलू
शायद तब मुझे भी मज़ा आये
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16 responses

  1. भगवान् चुप है पर हम धर्म का डंका बजाये फिरते है…

    सुंदर…

  2. “क्या सबसे पहले आग से, पका खाना और हुई दूर ठंड
    या दूसरो की गुफाओ को जलाने के लिए इसका हुआ था आविष्कार ?”
    beautiful! thought provoking… !

  3. this is the best from u….Kalam ko talwar kar do……Apni awaz may Aag bhardo……..Lao esa saleb ki…….unka aashiya bhi tabah kardo

  4. Bahut sahi sawal ,dharm ke naam per bawal machane walon ko bhi shayad iska utter nahi malum.Jab tak iska utter na mile,aag bujhani nahi chaye.

  5. वाह! हिंदी में भी!
    बहुत सार्थक.

  6. आपकी लेखनी में अभिव्यक्तिओं के साथ न्याय करने का सामर्थ्य है | आशा है आपकी रचनाधर्मिता इसी तरह से साहित्यप्रेमियों को अनुगृहित करती रहेगी | अनेकानेक शुभकामनाएँ

    1. आपकी सद्हृदयता के लिए धन्यवाद |आपकी भावना को कभी मैंने इस तरह महसूस किया था कि

      क्या तुम वो अहसास नहीं बन सकते
      जो कोमल भी हो, सुंदर भी
      गिरिजाघर, मस्जिद, मंदिर भी
      हो सुलेमान,शैलेन्द्र भी
      संदर्भ जहाँ मुस्काते हों
      और अहं जहाँ झुक जाते हों
      क्या वो इतिहास नहीं रच सकते ?
      क्या तुम वो अहसास नहीं बन सकते……………

  7. Wah Diwyansh ji aap toh shabdo ke dhani hai yah vardaan apne aap mei sabse amulya hai…ki jo baat dil mei ho ya zuba par use saamne wale tak bina koi badlaav ke pahuchaana…bahut sundar kaha aapne anekanek dhanyavaad, agar aap koi blog bhi likhte hai toh kripya uska link zarror bataye.

    1. अपनी भावनाओं से अगर पाठकों को अवगत करा सकूँ तो लेखनी के प्रति न्याय कर सकूंगा |आपकी साधुता को नमन करता हूँ |मेरी सृजन सरिता से आपका साक्षात्कार http://www.diwyansh.wordpress.com पर हो सकेगा |आशा करता हूँ मेरी रचनाओं में आपको अपनी अहसासों की उष्णता का आभास होगा |

      धन्यवाद

  8. भगवान (जिसे हम GOD और खुदा भी कहते हैं ) ने जाति और धर्म को देख कर इंसान नहीं रचे। उसने सबको एक सा खून दिया है ,एक सा दिमाग दिया है।

    आपकी यह कविता पढ़ कर बहुत अच्छा लगा।

    सादर

  9. bhari sawal poochh liye aapne ..sach mein bawal mach jayega !!!

शब्दों की झप्पी

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