सपनो का मेला

काश मैं होती एक नदी
पीछे छूटते किनारे
कम होती मेरी धारा
ना करते मेरी आँखें  नम
                                       काश मैं  होती एक पर्वत
                                       मेरे तन पर होता प्रहार
                                       निर्वस्त्र हुआ मेरा अंग
                                       न शर्मसार करते मेरा जीवन
काश मैं होती आकाश
बादलों के बरसने के बाद
सुनसान रातों में
ना महसूस करती मैं खालीपन
                                      पर अगर मिला होता मुझे यह वरदान
                                      तो मैं कहलाती भगवान्
                                      इंसान हूँ
                                      लालच की पोटली हूँ
                                      उम्मीदों और निराशाओं से सजी एक रचना हूँ
                                      आने की ख़ुशी,
                                      जाने का गम
                                      सबको दिल में समाये
                                     अपने साँसों में पिरोए जीए जाऊँगी
                                     और एक दिन कुछ दिलो में
                                     कुछ यादें,कहानिया,हंसी और दुःख
                                     सब छोड़ इन्ही हवाओं में मिल जाउंगी

ऐ अम्मा

पोटली भर आस लिएँ दो आँखें
चल पडी थी जाने कहाँ
आज बस स्टाप के नीचे है बैठी
कल तक था  एक पेड के नीचे उसका ठांव
कहते है पता बताने वाले ने लिखा था सिर्फ राह का ही नाम
मन्जिल बताता तो यह पहुँच नही जाती?
अब बैठी है सडक पर आँखें बिछायें
जाने कब से जाने कब तक
बचपन मे अम्मा की कही बात याद आ गई
एक टोकरी मे सामान लाद कर जब वह बापू के पास जाने लगती
तो अम्मा  कहती- अरी लाडो एक टोकरी मे सब मत डाल
गिर गया तो सब एक साथ बिखर जाएगा
पर अम्मा की भी कोई सुनता है भला
वह वैसे ही भागती और जोर से कहती
हाँ हाँ अम्मा अगली बार
और हंस के निकल जाती
आई थी अम्मा कल रात सपने मे
बोली बहुत सह चुकी लाडो
आ, मेरे पास आजा, देख तो बाल कितने रूखे हो गए है
पर अम्मा की भी  कोई  सुनता है भला
सपने मे भी आस से भरी वो आँखें
फिर  जोर से बोली
हाँ हाँ अम्मा अगली बार ज़रा नाती को देख लू
पर जाने क्यों इस बार लाडो को हंसी नही आई
एक रोज बारिश मे कोई  पकडा गया एक पुरानी टूटी छत्री
तो पगली उसे अपना समझ कर बोली
तु क्यों नही जन्मा रे मेरी कोख से
कहाँ था अब तक, अरे भाग मत यहाँ आ
ऐसे ही जाने कितनी आँखें
जाने कितनी पोटली भर आस और आह लिए बैठी है
सोचती होगी आज तो ज़रूर आएगा कोई
और बोलेगा अरे अम्मा तू यहाँ?
कब से तलाश कर रह था तेरी
चल तेरा कमरा तैयार है
गरम खाना खा कर आराम कर
चल अम्मा
ऐ अम्मा, अम्मा, ऐ अम्मा
चारो तरफ भीड बस स्टाप के
सब आज बुला रहे है पर पोटली चुप
लगता है आज इन आँखो ने अम्मा की सुन ली

छप्पन जी को हराना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है

छप्पन जी  का नाम ऐसा
क्योकि करते है वो  छप्पन  भोग
क्या करे भाग में ही
लिखा है उनके राजयोग
बड़ी कोशिश की सरकार ने
पर धन ना हुआ उनका कम
घूस ठूस ठूस कर खाते और
सब कर जाते हजम
लक्ष्मी  जी  भी  उनसे  रहती है
सदैव  प्रसन्न
जहा भी हाथ  लगाते है
वही पर उपजता है  धन
फिर एक दिन वे बोले जाना
है हमें तिहाड़
यह सुन कर मचा ऐसा शोर
जैसे गिरा हो कोई पहाड़
पूछा उनसे हमने
क्यों करते है ऐसा गज़ब
खुद से भी कोई जाता है जेल
आप के तो खेल ही अजब
बोले  छप्पन जी अरे तिहाड़
बन गया है एक बड़ा कोटेज इंडस्ट्री
और क्यों ना हो वहा  बैठी जो  है
लगभग सारी मिनिस्ट्री
हमें वहा मिल जाए एंट्री
तो कमाल हो जाए
अब तक बाहर कमाया
अब थोडा अन्दर भी हो जाए
अब सब तिहाड़ जाने के लिए
मचाये है हड़बड़ी
और छप्पन जी  के पीछे
घूम रहे है हर घड़ी
आपको मिलना हो तो आप भी बताये
        अरे क्या क्यों
जस्ट टू गेट एन  आईडिया सर जी

शाम की आँखों में

शाम की धूप के गीत अलग
उसके  नगमे  उसके सुर ताल अलग
सारे दिन की शिकन ओढ़े फिरती है
जाने कितने अरमान छुपाये फिरती है
उसके कदमों के  जज़्बात अलग
उसकी धडकनों की तड़प कुछ अलग
जाते जाते जाने क्या क्या कह जाना चाहती है यह
कहते कहते कितना छुपा जाती है यह
शाम की धूप  की मुस्कान देखो
उसकी चूड़ियों की खनक ही अलग
उसकी पायल की छम छम भी अलग
कभी बिन बोले रूठ कर छुप जाती है
कभी जाते जाते फिर लौट आती है
इसके  झूलों की पींगे कुछ अलग
इसके मेलो की हलचल कुछ अलग
जाने किस के इंतज़ार में खोई रहती है
कभी लगता है इसे जाने का गम है
कभी जैसे चाँद के आने की राह तकती
इसकी बेसब्री अलग
इसके  मन का धीर अलग
शाम के धुप  में हज़ारो मोती
हर मोती कितने अरमान लिए
कितने सपने करवट करवट
कभी बेबाक कभी शरमाती हुई
हर किरण एक एक ज़िंदगानी जैसी
हर एक किरण कुछ तेरे जैसी
हर एक किरण कुछ मेरे  जैसी

एक बंगला बने न्यारा

कल बड़े दिनों बाद बाज़ार में मिले संकटा बाबू
मिलते ही उन्होंने ने कहा काम से गए थे आबू
मैंने पूछा कैसे है सर आज कल दिखते ही नहीं
कई दिनों से ब्लाग आपका सूना पड़ा कुछ लिखते भी नहीं
संकटा बाबू बोले कि क्या कहें  सिचुएशन  है काम्प्लेक्स
होम लोन ने मार रखा है मुश्किल में है मेरे सपनो का ड्यूप्लेक्स
लोगो को तो सिर्फ दिखता है जो भी उपरी मैंने  कमाया
सोचते होंगे मुझे क्या चिंता मैंने तो बहुत  होगा जमाया
जानते है ऊपर का पैसा कैसे नीचे दबा कर रखना पड़ता है
क्योकि यह आईटी वालो कि आँखों में यह बहुत  जल्द अड़ता  है
ऊपर से सारे गोरख धंदे वाले जिस गति से तिहाड़ भर रहे है
उसी डर से मेरे सारे ऐसे वैसे पैसे दीवान में सड़ रहे है
यही मनाता हूँ कि कही कोई बुला ना ले दिल्ली
सुना है अच्छे अच्छे शेर वहां  हो जाते है भीगी बिल्ली
बढते ई ऍम आई ने ऐसी बजा राखी है बैंड
घर पूरा करना हो तो मिलानी पड़ेगी  सीमेंट में और ज्यादा सैंड
गया था आबू कि कही से हो जाए कुछ जुगाड़
और  इस महंगाई की कुछ कम हो जाए दहाड़
पर लक्ष्मी जी भी आज कल किसी की नहीं सुन रहीं
बढते महंगाई से बचा सके लगता है ऐसी कोई धुन नहीं
संकटा बाबू की इतनी और ऐसी बातें सुन मैं रह गयी स्तब्ध
क्या कहू,सांत्वना दू या सलाह, नहीं मिल रहे थे शब्द
कमाई उपरी हो या सीधी सब का हो रखा है  बुरा हाल
आर्थिक मंदी का दौर बड़ा बुरा जा रहा है  यह साल
हम सब तो अब तक  यही सोचते थे संकटा बाबू के क्या ठाठ
पर लगता है कैसे भी कमाओ सरकार दे ही देती है सबको मात
इसी लिए इस धनतेरस पर लक्ष्मी जी कि की जम के पूजा
और कहा माता एक घर बन जाए इसी आमदनी में मांगू वरदान  ना दूजा
~सोमा मुखर्जी ( सोमकृत्य)

कुछ लहरें नई

थोडा सस्पेंस कम कर या खुदा
या एक खाली स्लेट पर लिख दे  मेरा नाम
कि एक बार फिर से यह सफ़र करू शुरू
बड़ी बिखरी सी है यह ज़िन्दगी
समेटा नहीं जाता और अब
चादर को कब छोड़ पीछे निकल गयी बहुत दूर
अब बाहों के घेरे में सिर्फ खालीपन है और कुछ नहीं
दूर तक जहाँ तक यह नज़रे ले जाती है
माया का एक घेरा है
जो मैंने खुद एक दिन बड़े जतन से किया था तैयार
आज उसी चक्रव्यूह में फसी है साँसे
खुद के पर क़तर बड़े शान से रह रही थी जिन पिंजरों में
आज उन्ही में लगा है घुटने दम
थोडा सस्पेंस कम कर या खुदा
या एक खाली स्लेट पर लिख दे  मेरा नाम
कि धडकनों की आवाज़ फिर सुनाई देने लगी है,इस शोर में भी
शायद पेड़ो की छाँव
गर्मियों में तालाब की ठंडक
सर्दियों में बाहर  आग तापना
बचपन की यादों  से आकर बाहर
इस नए जीवन में भी होना चाहती है शामिल
फिर दिखने लगी है सपनो में तितलियाँ
फिर गुनगुनाने लगी हूँ मैं वही पुराने धुन
हर खाली कागज़ पर जी करता है बनाऊ
एक घर सामने जिसके बहती है एक नदी
एक सड़क और पीछे पहाड़ और उनके
बीच से निकलता एक प्यारा सा जगमगाता सूरज
थोडा सस्पेंस कम कर या खुदा
या खाली स्लेट पर लिख दे मेरा नाम
कि इस बार चुन लू एक नई राह
और उस पर चलू और लिखू  नए पन्ने
कुछ लहरें बुनू अपने नाम की इस बार
इस दुनिया के विशाल सागर में
कि इस बार करू कुछ नई गलतियाँ
और उन पर पछताऊं
शायद करू इस बार सब कुछ अलग
या डालू अपने  पुरानी गीतों में नई जान
थोडा …..

मेरे मन के सागर में

तुम पूछो तो मैं बोलू
कुछ राज़ मैं दिल के खोलू
कि कैसे तुम से पहले मन की तुम्हारी हवाएं मुझ तक पहुचाती है
कैसे तुम्हारे कदमो की आहट शाखें गा गा कर मुझे सुनाती है
कैसे बिन तुम फिरते है बादल सूखे से, जैसे कि हँसना भूल गए
कैसे बिन तुम पतझड़ अपनी हिम्मत खोने लगती है
तुम पूछो तो मैं बोलू
कुछ राज़ मैं दिल के खोलू
कि क्यों इस दिल की हर धड़कन सिर्फ गीत तुम्हारे  गाती है
क्यों बारिश कि हर बूँद जो मुझ पर गिरती है,लगता है तुमसे मिल कर आई है
क्यों यादों में मेरी बसे हो तुम, लिए खुशबू  इन्द्रधनुष के  हर रंग की
क्यों करती हूँ  तुम्हारी तस्वीरों से मैं इतनी बातें
तुम पूछो तो मैं बोलू
कुछ राज़ इस दिल के खोलू
कि  कैसे रात, तुम्हारे ख़्वाबों के आगोश में मुझको ले जाती है
कैसे  हर सुबह का सूरज तुम्हारा  नाम  लिए मुस्काती है
कैसे  चाय की हर चुस्की मन में जागती है एक प्यारा सा एहसास
कैसे  रस्ते की भीड़ मानो कहती है, आ मिल मुझमे हो सकता है वह दिख जाए
तुम पूछो तो मैं बोलू
कुछ राज़ इस दिल के खोलू

नटखट दोपहर

 
धुप को की खूब गुदगुदी और जोर से हंसी
छाँव को जी भर भिगोया और कीचड़ से की दोस्ती
पेड़ो पर फेंके अनगिनत रंग और भागी अन्दर
सूरज की सैंडविच बनाई और आँखें कर बड़ी बड़ी खा गयी सूरज
चिड़ियों को जो भी थाली में माँ ने परोसा था वह सब खिलाया
पापा से पुछा उनके जूते में जो दोस्त रखा था टर टर मेंढक वह अब भी है या नहीं
दादा जी की ऐनक को अलमारी में छुपाया
दादी की साड़ी पहन टीचर टीचर खेली
मेरी बिटिया ने किया यह सब कुछ
और मेरा बचपन लौट आया

चौकीदार

 
 
गली गली घूम घूम कहता है चौकीदार
होशियार होशियार होशियार
 
वह जो सामने से आ रही है चीख
गिड़गिड़ाती, मांगती ज़िन्दगी की भीख
उन साँसों की आह सुन, बंद मत कर किवाड़
आगे बड़ हिम्मत जुटा,बहानों की मत ले आड़
 
गली गली घूम घूम कहता है चौकीदार
सुन पुकार सुन पुकार सुन पुकार
 
मौन रह कायर ना बन, कुछ तो बोल,
कब से सो रहा है तू ,जाग अब आँखों को खोल
ज़िन्दगी हो रही है तार तार
बोल किसका कर रहा तू इंतज़ार
 
गली गली घूम घूम कहता है चौकीदार
खोल द्वार खोल द्वार खोल द्वार
 
पीड़ित शर्मसार हो जी रहे नज़रे झुका
अन्याय चल रहा उजाले में सर उठा
उसको रोक, करने से और वार
हो तू अकेले या हो संग चार
 
गली गली घूम घूम कहता है चौकीदार
तेरी आज है दरकार है दरकार है दरकार
 
नया कोई गीत, गा नई एक धुन
शाख शाख पर खुशिया आज तू बुन
ला किसी जीवन में आज तू बहार
ना मान हार अब, कर प्रयास बार बार
 
गली गली घूम घूम कहता है चौकीदार
हो तैयार हो तैयार हो तैयार

क्यों ….

 
इंसान को इंसान ही क्यों ना रहने दे
क्यों ना माने उसे माटी का ही एक पुतला
जिसमे हो घुला हर रंग
क्यों देवता मान कर पूजे किसी को
फिर एक ही क्षण में गिरा दे नजरो से
और करे शिकायत कि यह नाखुदा निकला
 
क्यों साधू संतो के इस देश में शांति कही नहीं
क्यों देवी देवताओ से भरा है देश और भक्ति है इतनी कम
क्यों करे अनसुना उसे, जिसकी सोच अलग
क्यों करे घृणा उससे ,क्यों रखे उससे बैर
उसका नजरिया क्यों गलत ,
सही गलत की हमे कितनी समझ
हमे किसने दिया किसी के जीवन पर यह हक
 
क्यों तोड़े उस हर फूल को जो मन को भाए
क्यों करे शिकार की किसी माटी के दीवार की शान बढ़े
कैसे अच्छा लगना यूँ हासिल करने में गया बदल
क्यों आज़ादी की गुहार लगाने वाले कानो को परकतरे पंछी की चीख नहीं सुनाई  देती
क्यों इंसान से ज़रूरी है सदियों से चले आ रहे रिवाज़
क्यों लाँखो सपने बुनने वाली यह आँखे टूटती ज़िन्दगी को नहीं देख पाती
 
क्यों शोर से कान नहीं फटते और दिल की,आँखों की सुनाई नहीं देती
क्यों हाथ उठाते देर नहीं लगती और जोड़ने में लगता है इतना वक़्त
क्यों दिल को चीर जाए ऐसे बोल अब हर क्षण हर गली में घूमते है
क्यों मेज़ पर चटखारे नहीं लेते हम , खाने की और बातों की
क्यों खट्टा मीठा सिर्फ खाने में और ज़िन्दगी बिलकुल बेस्वाद
क्यों बच्चो को सिर्फ अभी नहीं और बूढों को सिर्फ अब नहीं
क्यों देवी की पूजा करने वाले हाथ, झिझकते नहीं करते औरत का चीरहरण
 
क्यों हर सुबह आँखे खुलती है पर जागते नहीं हम
क्यों अध् जगी चेतना में ही यूँ भागते फिरते है हम
क्यों रहता है मन इतना बैचेन डरा डरा
क्यों है दिल यूँ शिकायतों से भरा
क्यों हंसी सहमे सहमे रखती है कदम
क्यों मासूम बचपन हो रहा है यूँ दफ़न
 
क्यों ….
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