Tag Archives: आव्हान

इन असुयन की पीर

कब का संग  छोड़  गयी
होली और दिवाली
लाल रंग के संग
छोड़ गयी पीछे
पिंजर में बंद
आस और मोह
आज भी होता है दर्द
आज भी हसी खिलती है होटों पर
आज भी आते है सपने
आज भी है रंगों से प्यार
इतना दहेज़ दिया तो बापू
दे देते थोडा अक्षर  दान
हो लेने देते पाँव पर खड़ा
फिर करते डोली पर सवार
आज इस धड़कन की चीख
मुझ में टकराती रहती है
और कहती है
लड़की बन जन्मी
वही क्या कम था अपराध
अब तू विधवा
खोया भी तुने
और तू ही है एक श्राप
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हैपी एंडिंग

                                    इसे कहानी कहिये या कविता
                                    जो  भी हो
                                   होगी हपी एंडिंग वाली
                                   इतना वादा करती हूँ
                                   तो सुनिए ऐसा है कि ……
खुले आसमान में उड़ते पंछी को कहाँ पता होता है
कि उसकी किस उड़ान पर बहेलिये की नज़र टिकी हुई है
कहाँ पता होता है
कि कौन सी उड़ान उसकी आखिरी उड़ान होगी
कहाँ पता होता है की जिस आज़ादी पर             
वह इतना इतराती गा रही  है
वह यूं ही  कभी भी उस से छीन ली जाएगी
और फिर एक दिन खुद को पिंजरे में बंद देख
कतराए पंखो पर चीखती चिल्लाती है
कोशिश करती है की किसी  को तरस आ जाये
फिर धीरे धीरे हार कर
इसे ही अपनी दुनिया मान जीने लगती है
और कभी कोई पिंजरे से बाहर छोड़ भी दे
तो वापस अपने पिंजरे में लौट आती है
आदत भी कमाल की चीज़ है
फिर चाहे वह गुलामी की ही क्यों ना हो….
                           कुछ ऐसा ही कहानी है  मिट्ठो की
                          पहले तो अपने घावो को छुपा लेती थी
                          इस डर से चुप चाप सब सह लेती थी
                          की उसकी छोटी सी गुडिया सुन ना ले
                          कही सब के सामने बात आ गयी तो
                           वह तो  शर्म से मर ही जायेगी
                           कितना आजीब है हमारे समाज का रिवाज़
                           जिस पर जुल्म होता है वही शर्म से मूँह छुपाये फिरता है
                           और करने वाला गर्दन ऊची कर ऐसे  घूमता रहता है
                           जैसे हाथ उठाना जानवरों  की तरह पेश आना
                           उसका जन्म सिद्ध  अधिकार है
और फिर एक दिन वह भी आया
जब जिस्म पर पड़े काले नीले निशानों को
शादी के अनगिनत सौगातो को
आँचल ने भी  छुपाने से इनकार कर दिया
कुछ नहीं बदला
ना रात ने उसकी सिसकियो को छुपाया
ना सुबह ने अपने आगोश में लिया उसे
जानने वाले सब जान गए
पर कौन किसी और के मामले में पड़े
मिट्ठो के घर का मामला है वही सुलझाए
हाँ उसकी हालत पर दो चार दिन बात की
फिर बात व्यंग पर, हंसी मज़ाक पर पहुच गयी
कुछ ने तो यह भी कह दिया ताली एक हाथ से नहीं बजती
या फिर
मर्द तो ऐसे ही होते है हम औरतो को समझना चाहिए
कुछ ने उसे सुझाया की वह पुलिस से मदद मांगे
पर मिट्ठो ही नहीं मानी
कहा था ना पिंजरे की आदत बड़े कमाल की आदत होती है
मिट्ठो तो शायद ऐसे ही मार खा खा कर  जी भी लेती
अगर उस दिन उसकी बेटी ने उसे देख नहीं लिया होता
जोर से रोने लगी और बोली पापा नहीं मम्मी को मत मारिये
मम्मी सॉरी बोलो ना
पापा तो अपने मर्दानगी और शराब के नशे में चूर
बेटी पर हाथ उठाने वाले ही थे की
मिट्ठो को जाने क्या हुआ
उठ खड़ी हुई और उस दरिन्दे का हाथ पकड़ लिया
और बोली
बस और नहीं… बस
बहुत हो गया
बेटी पर हाथ उठाया तो अच्छा नहीं होगा ….
जानते है यह दरिन्दे भी कमाल के डरपोक होते है
कभी दिल से आँखों में आँखें डाल दहाड़ कर देखिये
कैसे दुम दबा कर भागते है
अरे आपकी की खामोशी पर जो पलता है
उसे तो सिर्फ आपकी आवाज़ ही चुप करा सकती है ना
                                             चलिए कहानी को थोड़ा  छोटा कर आते है वर्तमान में
                                             मिट्ठो आज एक स्कूल में पढाती है
                                              स्वाबलंबी है
                                             और सच मानिए
                                             जैसे गुलामी एक आदत है
                                              तो स्वाबलंबन एक नशा
                                              खुली हवा का नशा
                                              अपने फैसले लेने का नशा
                                              सर उठा कर चलने का नशा
                                              अपने पैरो पर चलने का नशा
                                              और ऐसा ही एक नशा
                                               मिट्ठो ने अपनी बेटी को भी दे दिया है
                                               बड़ी होनहार है
                                               और सबसे बड़ी बात
                                               आज दोनों पंछी  आज़ाद है
                                              इस दुनिया में उड़ते फिरते है
                                              और गाते है जीवन के मधुर गीत
क्यों कहाँ था  ना हैपी  एंडिंग होगी
होगी  क्यों नहीं
मिट्ठो ने हिम्मत जो की
आप भी करिए
और इस बार सिर्फ अपनी बेटी के लिए नहीं
अपने लिए भी
एक हैपी  शुरुआत के लिए 🙂

यही तो है लोचा

                                      

जब  भी  कुछ  हो  जाता  है  बुरा

जब  भी  कोई  बजा  दे  बेसुरा

हम  लेते  है  गाँधी  जी  का  नाम  कहते  है

उन्होंने  ऐसा  तो  नहीं  होगा  सोचा

अरे  उन्होंने  गर  होता  भी  यह  सोचा

तो  भी  होता  यही  लोचा

राज  कर  रहे  भ्रष्ट , सब  जगह  बेईमानी

गुपचुप  बिकती  डॉलरों में  देश  की  कहानी

कोई  कुकर्मी  छूटा कोई  गया  पकड़ा

कोई  पैसे  के  दम  पर  गलत  बात  पर  अकड़ा

सरकार  और  ओपोज़िशन  के  नित  नए  नाटक

घूस  बिना  नहीं  खुलते  सरकारी  फाटक

ग्लोबल  वार्मिंग  ने  अलग  उड़ा रखे  है  होश

यह  ऊपर  से  नहीं  आया  हमारा  ही   है  दोष

उसपर  ओबामा  की  गुहार  भारत  ना  जाओ

भारतियों जितना पड़ो पर वह इलाज ना कराओ

खैर  उनकी  छोड़ो  जैसी  उनकी  विश

पर  यहाँ  आते  तो  पता  चलता

चिकन   टिक्का  नहीं  हमारा  नेशनल  डिश

आते  है  वापस  अपने  जन्मभूमि  पर  जिसका  है  बुरा  हाल

सब  तरफ  तबाही  फैली  जाने  कैसे  बीतेगा  यह  साल

सब  के  सब  घूम  रहे  हुए  बदहवास

गन्दा  मैला  पानी  और  ले  रहे  पोल्यूटेड  श्वास

कहा  तक  बचोगे  किस  किस  से  बचोगे , कब  जागोगे

सुधरो  और  सुधारो , अपनी  गलतियों  से  कब  तक  भागोगे

कल  होगा  तो  ना  कुछ  और  कर  पाओगे

वरना  वक़्त  से  पहले  सब  धुल  हो  जाओगे

नहीं ,  गाँधी  जी  ने  नहीं   यह  सब  सोचा

पर  हम  भी   नहीं  सोच  रहे  यही   तो  है  लोचा

मुझे आने दो ना माँ

 

नहीं चाहिए पालने की डोल

,ना देना नरम बिछौना

,बस तेरे आँचल की छाँव,

बस तेरी गोदी का सुख,

यही है मेरी भूख ,

एक बार बस एक बार

 गले लगा कर तुझे  पुकारु  माँ

 मुझे अपनी बिटिया बन इस धरती पर आने दो न माँ

कहो न मेरे पक्ष मे कुछ

दो न मेरा साथ

एक बार सबसे लड़ कर मुझे आने दो अपने पास

कह दो मैं भी अंश तुम्हारी

जैसे बेटा वैसी ही बेटी कह दो सबसे नही करोगी भेदभाव

नही छीनोगी मेरे जीने का  अधीकार

माँ तू हैं ना मेरे साथ ?

सुना है अपने  अधिकारो के लिए कभी लड़ी नही

 पर अन्दर हिम्मत की कमी नही

 चुपचाप सब की सुनती आयी

पर आवाज की खनक जिन्दा हैं अब भी

एक पल अपने उस जीवन की  खनक

मुझसे भी बांटो न माँ

आज  अपनी उस  हिम्मत से मेरा साथ निभा दो माँ

 उसी माँ की बेटी बन आ जाने दो न माँ

एक बार बस इस बार

जाने कितनी सदियों से भटक रही

कि वापस भेज रहे है लोग

हर बार तेरी कोख मे आते  ही

तुझसे अलग हो रही मैं

जैसे की इन्सान नही, हूँ मैं कोई रोग

एक औरत  हो  मुझ पर  यह  सब तू  क्यों  सह  लेती है  माँ

तेरी चीखों तेरी आंसुओ की जहाँ कदर नही

ऐसे समाज की रीत इस बार बदल  के देख न माँ

एक बार अपनी सुन कर मुझे पास बुला ले माँ

मैं तेरी बिटिया, तेरी परछाई हूँ

एक बार अपनी इस रचना को खिलने दे ना माँ

एक बार अपनी आवाज कर बुलन्द

 अपने होने का करा अहसास

 बन्द दरवाजो को खोल

आंखों में आँखे डाल कर बोल

 मुझे दे दिलासा कि  धरती परबोझ नही हूँ मैं

 वादा कर मुझसे कि तू अब बिगुल बजाएगी

हर उस औरत, जिसे तेरी ज़रुरत हो उसका साथ निभाएगी

 दे अपनी  सखियों  का  साथ मिला  कर उनसे हाथ

 उठ कर   मांग न  अपना हक

एक बार बस एक बार  मुझे आने दे न माँ

माँ , ओ माँ, आ रही हूँ  न मैं ?

 

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