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साहब की जय हो

यह रचना उन सभी साहब लोगो को समर्पित है जो इस दुनिया में भगवान् द्वारा डाईरेक्ट भेजे गए है…
इन्हें जन्म  लेने के लिए किसी तुच्छ मानव का सहारा नहीं लेना पड़ा
ऐसे नेता/अफसर/पडिंतो को मेरा साष्टांग प्रणाम
आप क्यों पूजा करते है सरकार
आप तो खुद ही देवता है
भगवान्  से ज्यादा जात पात पर मन लगाना
मंत्र कम गालियों का ज्यादा जाप करना
इसका धर्म-उसका कर्म, मन में इतनी कड़वाहट
आप क्यों कष्ट करते है सरकार
आप तो खुद ही देवता है
*
बात बात पर लोगो  को झिड़कना
रात दिन सबपर पर हुकुम चलाना
आप दुनिया का नहीं, दुनिया आपका हिस्सा है
बड़े बड़े अफसर आपके जूते चमकाएं
आप को क्यों चाहिए आशीर्वाद सरकार
आप तो खुद ही देवता है
*
रहनें  दें  यह अगरबत्तियों और मालाओं का खेल
ये धूप बताशो घंटियों की रेल पेल
कल से अपनी मूर्ती को दीजिये ये उपहार
या फिर आइने के सामने खड़े हो
अपनी ही आरती लीजिये उतार
आप ऐसा ही कीजिये सरकार
आप तो खुद ही देवता है

फिर कभी

ये लकीरें जो अब शरीर से लिपटी रहती है
ऐसा लगता है जैसे
बूढ़ी दादी ने झुर्रियों का गहना पहन रखा है
कितनी कहानिया समेटे अपने तन पर
जाने इनमे कितनी हंसी,कितने आंसुओ
सवालों का हिसाब होगा
पूछो तो कहती है फिर कभी
एक एक झुर्री जैसे किताब का पिछला पन्ना
और इन्ही सलवटो मैं  है दो चुप सी आँखें
झुर्रिया जितनी बातूनी आँखे उतनी ही खामोश
कभी कभी किसी  अपने का फोन आता है तो
दिवाली के दिये की तरह इनमे भी रौशनी जगमगा उठती है
और रात होते होते फिर आज को पीछे छोड़ ये आखें खामोश हो जाती है
कभी कभी लगता है दादी के शरीर पर हर आज कल के लिए एक झुर्री छोड़ जाती है
कितना पूछा कुछ बताओ ना
पर हंस कर टाल ही जाती है
दादी के हर झुर्री समेट लू तो बड़ा उपन्यास बन जाए
दर्द का,ख़ुशी का,ठहाको और आंसुओ का
जाने कितनी मिन्नतों  शिकायतों का सागर होगा
पर पूछो तो कहती है……

इन असुयन की पीर

कब का संग  छोड़  गयी
होली और दिवाली
लाल रंग के संग
छोड़ गयी पीछे
पिंजर में बंद
आस और मोह
आज भी होता है दर्द
आज भी हसी खिलती है होटों पर
आज भी आते है सपने
आज भी है रंगों से प्यार
इतना दहेज़ दिया तो बापू
दे देते थोडा अक्षर  दान
हो लेने देते पाँव पर खड़ा
फिर करते डोली पर सवार
आज इस धड़कन की चीख
मुझ में टकराती रहती है
और कहती है
लड़की बन जन्मी
वही क्या कम था अपराध
अब तू विधवा
खोया भी तुने
और तू ही है एक श्राप

डाल डाल पर नया साल

नया साल कैसा होगा
नया साल ऐसा होगा
ऐसा वैसा करते करते
लो आ गया नया साल
और कैसा होगा
कुछ जाना सा कुछ अनजाना सा
थोडा इतर थोडा परफ्यूम
वही गाना बजाना
वही बरात में पागलो सा नाचना
वही सुबह स्कूल  ना जाने की जिद
वही सन्डे के आने की ख़ुशी
वही मंडे के आने का गम
वही अचार और मुरब्बे
वही बाल लम्बे रखू या छोटे पर लम्बी बहस
वही सब और उन सब में नए साल का एक ट्विस्ट
वही जी भर के खाना और फिर बढते वजन पर रोना
वही पकवानों पर चटनियों के किस्से
वही गर्मी में सर्दियों और सर्दियों में गर्मियों को याद करना
वही दोस्तों के साथ पुरानी बातें खोद कर उन पर हसना
वही चाय और समोसे का रोमांस
वही एक्स्ट्रा गोलगप्पा सूखा सेव डाल कर खाना
और इन सब में नए साल का तड़का
नया साल आएगा और पुराना हो जायेगा
और लोग महंगाई
सरकार के धमाके
क्रिकेट
सांस बहू के सीरियल
दोपहर तीन बजे की गपशप
इन्ही सब में सब भूल जायेंगे
इसी में ही तो जीवन है
और इन्ही सब में जीवन के लाखो रंग
यही सब और इनमे नए साल के कुछ पत्ते
दिल से जियो  जी भर के जियो

सर उठा के सम्मान से जियो
आप सभी को  नए साल के सभी पुराने किस्से
और उनमे भरने वाले हर नए रंग बहुत बहुत मुबारक

 

सपनो का मेला

काश मैं होती एक नदी
पीछे छूटते किनारे
कम होती मेरी धारा
ना करते मेरी आँखें  नम
                                       काश मैं  होती एक पर्वत
                                       मेरे तन पर होता प्रहार
                                       निर्वस्त्र हुआ मेरा अंग
                                       न शर्मसार करते मेरा जीवन
काश मैं होती आकाश
बादलों के बरसने के बाद
सुनसान रातों में
ना महसूस करती मैं खालीपन
                                      पर अगर मिला होता मुझे यह वरदान
                                      तो मैं कहलाती भगवान्
                                      इंसान हूँ
                                      लालच की पोटली हूँ
                                      उम्मीदों और निराशाओं से सजी एक रचना हूँ
                                      आने की ख़ुशी,
                                      जाने का गम
                                      सबको दिल में समाये
                                     अपने साँसों में पिरोए जीए जाऊँगी
                                     और एक दिन कुछ दिलो में
                                     कुछ यादें,कहानिया,हंसी और दुःख
                                     सब छोड़ इन्ही हवाओं में मिल जाउंगी

छप्पन जी को हराना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है

छप्पन जी  का नाम ऐसा
क्योकि करते है वो  छप्पन  भोग
क्या करे भाग में ही
लिखा है उनके राजयोग
बड़ी कोशिश की सरकार ने
पर धन ना हुआ उनका कम
घूस ठूस ठूस कर खाते और
सब कर जाते हजम
लक्ष्मी  जी  भी  उनसे  रहती है
सदैव  प्रसन्न
जहा भी हाथ  लगाते है
वही पर उपजता है  धन
फिर एक दिन वे बोले जाना
है हमें तिहाड़
यह सुन कर मचा ऐसा शोर
जैसे गिरा हो कोई पहाड़
पूछा उनसे हमने
क्यों करते है ऐसा गज़ब
खुद से भी कोई जाता है जेल
आप के तो खेल ही अजब
बोले  छप्पन जी अरे तिहाड़
बन गया है एक बड़ा कोटेज इंडस्ट्री
और क्यों ना हो वहा  बैठी जो  है
लगभग सारी मिनिस्ट्री
हमें वहा मिल जाए एंट्री
तो कमाल हो जाए
अब तक बाहर कमाया
अब थोडा अन्दर भी हो जाए
अब सब तिहाड़ जाने के लिए
मचाये है हड़बड़ी
और छप्पन जी  के पीछे
घूम रहे है हर घड़ी
आपको मिलना हो तो आप भी बताये
        अरे क्या क्यों
जस्ट टू गेट एन  आईडिया सर जी

शाम की आँखों में

शाम की धूप के गीत अलग
उसके  नगमे  उसके सुर ताल अलग
सारे दिन की शिकन ओढ़े फिरती है
जाने कितने अरमान छुपाये फिरती है
उसके कदमों के  जज़्बात अलग
उसकी धडकनों की तड़प कुछ अलग
जाते जाते जाने क्या क्या कह जाना चाहती है यह
कहते कहते कितना छुपा जाती है यह
शाम की धूप  की मुस्कान देखो
उसकी चूड़ियों की खनक ही अलग
उसकी पायल की छम छम भी अलग
कभी बिन बोले रूठ कर छुप जाती है
कभी जाते जाते फिर लौट आती है
इसके  झूलों की पींगे कुछ अलग
इसके मेलो की हलचल कुछ अलग
जाने किस के इंतज़ार में खोई रहती है
कभी लगता है इसे जाने का गम है
कभी जैसे चाँद के आने की राह तकती
इसकी बेसब्री अलग
इसके  मन का धीर अलग
शाम के धुप  में हज़ारो मोती
हर मोती कितने अरमान लिए
कितने सपने करवट करवट
कभी बेबाक कभी शरमाती हुई
हर किरण एक एक ज़िंदगानी जैसी
हर एक किरण कुछ तेरे जैसी
हर एक किरण कुछ मेरे  जैसी

एक बंगला बने न्यारा

कल बड़े दिनों बाद बाज़ार में मिले संकटा बाबू
मिलते ही उन्होंने ने कहा काम से गए थे आबू
मैंने पूछा कैसे है सर आज कल दिखते ही नहीं
कई दिनों से ब्लाग आपका सूना पड़ा कुछ लिखते भी नहीं
संकटा बाबू बोले कि क्या कहें  सिचुएशन  है काम्प्लेक्स
होम लोन ने मार रखा है मुश्किल में है मेरे सपनो का ड्यूप्लेक्स
लोगो को तो सिर्फ दिखता है जो भी उपरी मैंने  कमाया
सोचते होंगे मुझे क्या चिंता मैंने तो बहुत  होगा जमाया
जानते है ऊपर का पैसा कैसे नीचे दबा कर रखना पड़ता है
क्योकि यह आईटी वालो कि आँखों में यह बहुत  जल्द अड़ता  है
ऊपर से सारे गोरख धंदे वाले जिस गति से तिहाड़ भर रहे है
उसी डर से मेरे सारे ऐसे वैसे पैसे दीवान में सड़ रहे है
यही मनाता हूँ कि कही कोई बुला ना ले दिल्ली
सुना है अच्छे अच्छे शेर वहां  हो जाते है भीगी बिल्ली
बढते ई ऍम आई ने ऐसी बजा राखी है बैंड
घर पूरा करना हो तो मिलानी पड़ेगी  सीमेंट में और ज्यादा सैंड
गया था आबू कि कही से हो जाए कुछ जुगाड़
और  इस महंगाई की कुछ कम हो जाए दहाड़
पर लक्ष्मी जी भी आज कल किसी की नहीं सुन रहीं
बढते महंगाई से बचा सके लगता है ऐसी कोई धुन नहीं
संकटा बाबू की इतनी और ऐसी बातें सुन मैं रह गयी स्तब्ध
क्या कहू,सांत्वना दू या सलाह, नहीं मिल रहे थे शब्द
कमाई उपरी हो या सीधी सब का हो रखा है  बुरा हाल
आर्थिक मंदी का दौर बड़ा बुरा जा रहा है  यह साल
हम सब तो अब तक  यही सोचते थे संकटा बाबू के क्या ठाठ
पर लगता है कैसे भी कमाओ सरकार दे ही देती है सबको मात
इसी लिए इस धनतेरस पर लक्ष्मी जी कि की जम के पूजा
और कहा माता एक घर बन जाए इसी आमदनी में मांगू वरदान  ना दूजा
~सोमा मुखर्जी ( सोमकृत्य)

कुछ लहरें नई

थोडा सस्पेंस कम कर या खुदा
या एक खाली स्लेट पर लिख दे  मेरा नाम
कि एक बार फिर से यह सफ़र करू शुरू
बड़ी बिखरी सी है यह ज़िन्दगी
समेटा नहीं जाता और अब
चादर को कब छोड़ पीछे निकल गयी बहुत दूर
अब बाहों के घेरे में सिर्फ खालीपन है और कुछ नहीं
दूर तक जहाँ तक यह नज़रे ले जाती है
माया का एक घेरा है
जो मैंने खुद एक दिन बड़े जतन से किया था तैयार
आज उसी चक्रव्यूह में फसी है साँसे
खुद के पर क़तर बड़े शान से रह रही थी जिन पिंजरों में
आज उन्ही में लगा है घुटने दम
थोडा सस्पेंस कम कर या खुदा
या एक खाली स्लेट पर लिख दे  मेरा नाम
कि धडकनों की आवाज़ फिर सुनाई देने लगी है,इस शोर में भी
शायद पेड़ो की छाँव
गर्मियों में तालाब की ठंडक
सर्दियों में बाहर  आग तापना
बचपन की यादों  से आकर बाहर
इस नए जीवन में भी होना चाहती है शामिल
फिर दिखने लगी है सपनो में तितलियाँ
फिर गुनगुनाने लगी हूँ मैं वही पुराने धुन
हर खाली कागज़ पर जी करता है बनाऊ
एक घर सामने जिसके बहती है एक नदी
एक सड़क और पीछे पहाड़ और उनके
बीच से निकलता एक प्यारा सा जगमगाता सूरज
थोडा सस्पेंस कम कर या खुदा
या खाली स्लेट पर लिख दे मेरा नाम
कि इस बार चुन लू एक नई राह
और उस पर चलू और लिखू  नए पन्ने
कुछ लहरें बुनू अपने नाम की इस बार
इस दुनिया के विशाल सागर में
कि इस बार करू कुछ नई गलतियाँ
और उन पर पछताऊं
शायद करू इस बार सब कुछ अलग
या डालू अपने  पुरानी गीतों में नई जान
थोडा …..

मेरे मन के सागर में

तुम पूछो तो मैं बोलू
कुछ राज़ मैं दिल के खोलू
कि कैसे तुम से पहले मन की तुम्हारी हवाएं मुझ तक पहुचाती है
कैसे तुम्हारे कदमो की आहट शाखें गा गा कर मुझे सुनाती है
कैसे बिन तुम फिरते है बादल सूखे से, जैसे कि हँसना भूल गए
कैसे बिन तुम पतझड़ अपनी हिम्मत खोने लगती है
तुम पूछो तो मैं बोलू
कुछ राज़ मैं दिल के खोलू
कि क्यों इस दिल की हर धड़कन सिर्फ गीत तुम्हारे  गाती है
क्यों बारिश कि हर बूँद जो मुझ पर गिरती है,लगता है तुमसे मिल कर आई है
क्यों यादों में मेरी बसे हो तुम, लिए खुशबू  इन्द्रधनुष के  हर रंग की
क्यों करती हूँ  तुम्हारी तस्वीरों से मैं इतनी बातें
तुम पूछो तो मैं बोलू
कुछ राज़ इस दिल के खोलू
कि  कैसे रात, तुम्हारे ख़्वाबों के आगोश में मुझको ले जाती है
कैसे  हर सुबह का सूरज तुम्हारा  नाम  लिए मुस्काती है
कैसे  चाय की हर चुस्की मन में जागती है एक प्यारा सा एहसास
कैसे  रस्ते की भीड़ मानो कहती है, आ मिल मुझमे हो सकता है वह दिख जाए
तुम पूछो तो मैं बोलू
कुछ राज़ इस दिल के खोलू
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