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एक अरज

कोई आंधी मुझे  क्या तोड़े

मेरे सपनो  में  हौसलों के रंग

बस इतना करम करे मेरा भगवान्

न आसमान से वफ़ा में हो कमी

और न ज़मीन को जफ़ा दे कदम

कॉपीराइट 2013 @सोमक्रित्य

साहब की जय हो

यह रचना उन सभी साहब लोगो को समर्पित है जो इस दुनिया में भगवान् द्वारा डाईरेक्ट भेजे गए है…
इन्हें जन्म  लेने के लिए किसी तुच्छ मानव का सहारा नहीं लेना पड़ा
ऐसे नेता/अफसर/पडिंतो को मेरा साष्टांग प्रणाम
आप क्यों पूजा करते है सरकार
आप तो खुद ही देवता है
भगवान्  से ज्यादा जात पात पर मन लगाना
मंत्र कम गालियों का ज्यादा जाप करना
इसका धर्म-उसका कर्म, मन में इतनी कड़वाहट
आप क्यों कष्ट करते है सरकार
आप तो खुद ही देवता है
*
बात बात पर लोगो  को झिड़कना
रात दिन सबपर पर हुकुम चलाना
आप दुनिया का नहीं, दुनिया आपका हिस्सा है
बड़े बड़े अफसर आपके जूते चमकाएं
आप को क्यों चाहिए आशीर्वाद सरकार
आप तो खुद ही देवता है
*
रहनें  दें  यह अगरबत्तियों और मालाओं का खेल
ये धूप बताशो घंटियों की रेल पेल
कल से अपनी मूर्ती को दीजिये ये उपहार
या फिर आइने के सामने खड़े हो
अपनी ही आरती लीजिये उतार
आप ऐसा ही कीजिये सरकार
आप तो खुद ही देवता है

सुबह की चुस्की

image courtsey Google

आज सुबह जब
अपनी पंखुड़ी खोले
तू भी उठ कर देख
~
देख की क्या नशा है
सुबह में आज
कैसे हवा नए रंग लिए
मस्त मगन हो डोल रही
कैसे कली नए पौशाख पहन
 खिलने को हो रही आतुर
कैसे पंछियों ने नए गीतों के
बांधे है नए बंधनवार
कैसे रात का बादल  सूरज की तेज़
से नहा रहा है आज
~~~~~
अरे उठ पगले
अम्मा आवाज दे दे कर थक गयी
नींद को पेड़ पर दे टांग
टहनी से कह
रात तक करे उसकी देखभाल
बंदरो से कह
कूद कूद करे रखे नींद को तैयार
कि जब थक जाए यह शरीर
तो आने में ना करे आज देर
तब तक इस नए सुबह कि चुस्कियों से
मन को कर तरो ताज़ा
आगे बढ़
और नए रास्तो से
आज कर पहचान
लिख गीत ऐसे
कि कल पंछी
उसी गीत से
करे सुबह का आव्हान

फिर कभी

ये लकीरें जो अब शरीर से लिपटी रहती है
ऐसा लगता है जैसे
बूढ़ी दादी ने झुर्रियों का गहना पहन रखा है
कितनी कहानिया समेटे अपने तन पर
जाने इनमे कितनी हंसी,कितने आंसुओ
सवालों का हिसाब होगा
पूछो तो कहती है फिर कभी
एक एक झुर्री जैसे किताब का पिछला पन्ना
और इन्ही सलवटो मैं  है दो चुप सी आँखें
झुर्रिया जितनी बातूनी आँखे उतनी ही खामोश
कभी कभी किसी  अपने का फोन आता है तो
दिवाली के दिये की तरह इनमे भी रौशनी जगमगा उठती है
और रात होते होते फिर आज को पीछे छोड़ ये आखें खामोश हो जाती है
कभी कभी लगता है दादी के शरीर पर हर आज कल के लिए एक झुर्री छोड़ जाती है
कितना पूछा कुछ बताओ ना
पर हंस कर टाल ही जाती है
दादी के हर झुर्री समेट लू तो बड़ा उपन्यास बन जाए
दर्द का,ख़ुशी का,ठहाको और आंसुओ का
जाने कितनी मिन्नतों  शिकायतों का सागर होगा
पर पूछो तो कहती है……

माया बड़ी ठगनी

माया की माया नगरी में      
सब कुछ बड़ा कमाल
चोर लुटेरे राज कर रहे
नित नए होते धमाल
                     सड़क खुदी बरसो से
                     और नहरे है खाली
                    पुलिस प्रशासन नदारद
                     उपवन लूटे माली
वैसे तो यू पी में
होते रहते है दंगल
पर उन सब में अनोखा
एक ही है गजब का जंगल
                      माया जी की महिमा
                    मूर्तियों में समायी
                    नगर प्रशासन सो रहे
                   अर्थ व्यवस्था धराशायी
जीजी की जी हजूरी में
सब हो रहा बरबाद
अगर ना हो विश्वास
आ जाओ  गाज़ियाबाद

एक बंगला बने न्यारा

कल बड़े दिनों बाद बाज़ार में मिले संकटा बाबू
मिलते ही उन्होंने ने कहा काम से गए थे आबू
मैंने पूछा कैसे है सर आज कल दिखते ही नहीं
कई दिनों से ब्लाग आपका सूना पड़ा कुछ लिखते भी नहीं
संकटा बाबू बोले कि क्या कहें  सिचुएशन  है काम्प्लेक्स
होम लोन ने मार रखा है मुश्किल में है मेरे सपनो का ड्यूप्लेक्स
लोगो को तो सिर्फ दिखता है जो भी उपरी मैंने  कमाया
सोचते होंगे मुझे क्या चिंता मैंने तो बहुत  होगा जमाया
जानते है ऊपर का पैसा कैसे नीचे दबा कर रखना पड़ता है
क्योकि यह आईटी वालो कि आँखों में यह बहुत  जल्द अड़ता  है
ऊपर से सारे गोरख धंदे वाले जिस गति से तिहाड़ भर रहे है
उसी डर से मेरे सारे ऐसे वैसे पैसे दीवान में सड़ रहे है
यही मनाता हूँ कि कही कोई बुला ना ले दिल्ली
सुना है अच्छे अच्छे शेर वहां  हो जाते है भीगी बिल्ली
बढते ई ऍम आई ने ऐसी बजा राखी है बैंड
घर पूरा करना हो तो मिलानी पड़ेगी  सीमेंट में और ज्यादा सैंड
गया था आबू कि कही से हो जाए कुछ जुगाड़
और  इस महंगाई की कुछ कम हो जाए दहाड़
पर लक्ष्मी जी भी आज कल किसी की नहीं सुन रहीं
बढते महंगाई से बचा सके लगता है ऐसी कोई धुन नहीं
संकटा बाबू की इतनी और ऐसी बातें सुन मैं रह गयी स्तब्ध
क्या कहू,सांत्वना दू या सलाह, नहीं मिल रहे थे शब्द
कमाई उपरी हो या सीधी सब का हो रखा है  बुरा हाल
आर्थिक मंदी का दौर बड़ा बुरा जा रहा है  यह साल
हम सब तो अब तक  यही सोचते थे संकटा बाबू के क्या ठाठ
पर लगता है कैसे भी कमाओ सरकार दे ही देती है सबको मात
इसी लिए इस धनतेरस पर लक्ष्मी जी कि की जम के पूजा
और कहा माता एक घर बन जाए इसी आमदनी में मांगू वरदान  ना दूजा
~सोमा मुखर्जी ( सोमकृत्य)

कुछ लहरें नई

थोडा सस्पेंस कम कर या खुदा
या एक खाली स्लेट पर लिख दे  मेरा नाम
कि एक बार फिर से यह सफ़र करू शुरू
बड़ी बिखरी सी है यह ज़िन्दगी
समेटा नहीं जाता और अब
चादर को कब छोड़ पीछे निकल गयी बहुत दूर
अब बाहों के घेरे में सिर्फ खालीपन है और कुछ नहीं
दूर तक जहाँ तक यह नज़रे ले जाती है
माया का एक घेरा है
जो मैंने खुद एक दिन बड़े जतन से किया था तैयार
आज उसी चक्रव्यूह में फसी है साँसे
खुद के पर क़तर बड़े शान से रह रही थी जिन पिंजरों में
आज उन्ही में लगा है घुटने दम
थोडा सस्पेंस कम कर या खुदा
या एक खाली स्लेट पर लिख दे  मेरा नाम
कि धडकनों की आवाज़ फिर सुनाई देने लगी है,इस शोर में भी
शायद पेड़ो की छाँव
गर्मियों में तालाब की ठंडक
सर्दियों में बाहर  आग तापना
बचपन की यादों  से आकर बाहर
इस नए जीवन में भी होना चाहती है शामिल
फिर दिखने लगी है सपनो में तितलियाँ
फिर गुनगुनाने लगी हूँ मैं वही पुराने धुन
हर खाली कागज़ पर जी करता है बनाऊ
एक घर सामने जिसके बहती है एक नदी
एक सड़क और पीछे पहाड़ और उनके
बीच से निकलता एक प्यारा सा जगमगाता सूरज
थोडा सस्पेंस कम कर या खुदा
या खाली स्लेट पर लिख दे मेरा नाम
कि इस बार चुन लू एक नई राह
और उस पर चलू और लिखू  नए पन्ने
कुछ लहरें बुनू अपने नाम की इस बार
इस दुनिया के विशाल सागर में
कि इस बार करू कुछ नई गलतियाँ
और उन पर पछताऊं
शायद करू इस बार सब कुछ अलग
या डालू अपने  पुरानी गीतों में नई जान
थोडा …..

खट्टी मीठी

कभी मीठे आंसू
कभी नमकीन हंसी
चुलबुली नटखट सी
बात बात पर रूठती
कभी अचानक ही ठहाके मारती
कभी सादी खिचड़ी
कभी चटपटी चाट
कभी तेज़ धार बन बहती
कभी सभल संभल  कर चलती
यह मेरी हलकी हलकी गर्म सर्द
रेशम और कपास जैसी ज़िन्दगी
पत्थरो को सीचती नर्म रेशम
फूलों को सिखाती मीठी मीठी बदमाशिया
मछलियों से करती गपशप
चिड़ियों को दाने दे कर बहलाती
पेड़ो से छंद मांगती उधार
बादलो से  सपनो को तराशती
कितनी कहानिया बुनती
और उनकी पोटली बना कर बहाती नदियों में
परछाइयों से पूछती सवाल
चांदनी ओढ़ सूरज  को घूरती
डूबती तैरती ,खेलती कूदती
बोलती सुनती एक  रोचक किताब सी मेरी ज़िन्दगी
कभी जोकर बन कर हँसाती कभी जोकर बनाती
कभी गुस्सा कभी प्यार
कभी यह सोचू की क्या करू
कभी कर जाऊ और सोचू की सोच लिया होता
कभी बात सुनते सुनते खो जाऊ अपनी दुनिया में
कभी तलाशती फिरू इसके मायने
ठण्ड की लम्बी रातो में लम्बी कहानियो  जैसी
थोड़ी सच्ची थोड़ी झूठी
यह कुछ पागल सी बावली सी मेरी ज़िन्दगी
ऐसी वैसी सबसे हट कर
सब के जैसी मेरी ज़िन्दगी
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