Tag Archives: हिंदी कविता

एक अरज

कोई आंधी मुझे  क्या तोड़े

मेरे सपनो  में  हौसलों के रंग

बस इतना करम करे मेरा भगवान्

न आसमान से वफ़ा में हो कमी

और न ज़मीन को जफ़ा दे कदम

कॉपीराइट 2013 @सोमक्रित्य

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हैपी एंडिंग

                                    इसे कहानी कहिये या कविता
                                    जो  भी हो
                                   होगी हपी एंडिंग वाली
                                   इतना वादा करती हूँ
                                   तो सुनिए ऐसा है कि ……
खुले आसमान में उड़ते पंछी को कहाँ पता होता है
कि उसकी किस उड़ान पर बहेलिये की नज़र टिकी हुई है
कहाँ पता होता है
कि कौन सी उड़ान उसकी आखिरी उड़ान होगी
कहाँ पता होता है की जिस आज़ादी पर             
वह इतना इतराती गा रही  है
वह यूं ही  कभी भी उस से छीन ली जाएगी
और फिर एक दिन खुद को पिंजरे में बंद देख
कतराए पंखो पर चीखती चिल्लाती है
कोशिश करती है की किसी  को तरस आ जाये
फिर धीरे धीरे हार कर
इसे ही अपनी दुनिया मान जीने लगती है
और कभी कोई पिंजरे से बाहर छोड़ भी दे
तो वापस अपने पिंजरे में लौट आती है
आदत भी कमाल की चीज़ है
फिर चाहे वह गुलामी की ही क्यों ना हो….
                           कुछ ऐसा ही कहानी है  मिट्ठो की
                          पहले तो अपने घावो को छुपा लेती थी
                          इस डर से चुप चाप सब सह लेती थी
                          की उसकी छोटी सी गुडिया सुन ना ले
                          कही सब के सामने बात आ गयी तो
                           वह तो  शर्म से मर ही जायेगी
                           कितना आजीब है हमारे समाज का रिवाज़
                           जिस पर जुल्म होता है वही शर्म से मूँह छुपाये फिरता है
                           और करने वाला गर्दन ऊची कर ऐसे  घूमता रहता है
                           जैसे हाथ उठाना जानवरों  की तरह पेश आना
                           उसका जन्म सिद्ध  अधिकार है
और फिर एक दिन वह भी आया
जब जिस्म पर पड़े काले नीले निशानों को
शादी के अनगिनत सौगातो को
आँचल ने भी  छुपाने से इनकार कर दिया
कुछ नहीं बदला
ना रात ने उसकी सिसकियो को छुपाया
ना सुबह ने अपने आगोश में लिया उसे
जानने वाले सब जान गए
पर कौन किसी और के मामले में पड़े
मिट्ठो के घर का मामला है वही सुलझाए
हाँ उसकी हालत पर दो चार दिन बात की
फिर बात व्यंग पर, हंसी मज़ाक पर पहुच गयी
कुछ ने तो यह भी कह दिया ताली एक हाथ से नहीं बजती
या फिर
मर्द तो ऐसे ही होते है हम औरतो को समझना चाहिए
कुछ ने उसे सुझाया की वह पुलिस से मदद मांगे
पर मिट्ठो ही नहीं मानी
कहा था ना पिंजरे की आदत बड़े कमाल की आदत होती है
मिट्ठो तो शायद ऐसे ही मार खा खा कर  जी भी लेती
अगर उस दिन उसकी बेटी ने उसे देख नहीं लिया होता
जोर से रोने लगी और बोली पापा नहीं मम्मी को मत मारिये
मम्मी सॉरी बोलो ना
पापा तो अपने मर्दानगी और शराब के नशे में चूर
बेटी पर हाथ उठाने वाले ही थे की
मिट्ठो को जाने क्या हुआ
उठ खड़ी हुई और उस दरिन्दे का हाथ पकड़ लिया
और बोली
बस और नहीं… बस
बहुत हो गया
बेटी पर हाथ उठाया तो अच्छा नहीं होगा ….
जानते है यह दरिन्दे भी कमाल के डरपोक होते है
कभी दिल से आँखों में आँखें डाल दहाड़ कर देखिये
कैसे दुम दबा कर भागते है
अरे आपकी की खामोशी पर जो पलता है
उसे तो सिर्फ आपकी आवाज़ ही चुप करा सकती है ना
                                             चलिए कहानी को थोड़ा  छोटा कर आते है वर्तमान में
                                             मिट्ठो आज एक स्कूल में पढाती है
                                              स्वाबलंबी है
                                             और सच मानिए
                                             जैसे गुलामी एक आदत है
                                              तो स्वाबलंबन एक नशा
                                              खुली हवा का नशा
                                              अपने फैसले लेने का नशा
                                              सर उठा कर चलने का नशा
                                              अपने पैरो पर चलने का नशा
                                              और ऐसा ही एक नशा
                                               मिट्ठो ने अपनी बेटी को भी दे दिया है
                                               बड़ी होनहार है
                                               और सबसे बड़ी बात
                                               आज दोनों पंछी  आज़ाद है
                                              इस दुनिया में उड़ते फिरते है
                                              और गाते है जीवन के मधुर गीत
क्यों कहाँ था  ना हैपी  एंडिंग होगी
होगी  क्यों नहीं
मिट्ठो ने हिम्मत जो की
आप भी करिए
और इस बार सिर्फ अपनी बेटी के लिए नहीं
अपने लिए भी
एक हैपी  शुरुआत के लिए 🙂

यही तो है लोचा

                                      

जब  भी  कुछ  हो  जाता  है  बुरा

जब  भी  कोई  बजा  दे  बेसुरा

हम  लेते  है  गाँधी  जी  का  नाम  कहते  है

उन्होंने  ऐसा  तो  नहीं  होगा  सोचा

अरे  उन्होंने  गर  होता  भी  यह  सोचा

तो  भी  होता  यही  लोचा

राज  कर  रहे  भ्रष्ट , सब  जगह  बेईमानी

गुपचुप  बिकती  डॉलरों में  देश  की  कहानी

कोई  कुकर्मी  छूटा कोई  गया  पकड़ा

कोई  पैसे  के  दम  पर  गलत  बात  पर  अकड़ा

सरकार  और  ओपोज़िशन  के  नित  नए  नाटक

घूस  बिना  नहीं  खुलते  सरकारी  फाटक

ग्लोबल  वार्मिंग  ने  अलग  उड़ा रखे  है  होश

यह  ऊपर  से  नहीं  आया  हमारा  ही   है  दोष

उसपर  ओबामा  की  गुहार  भारत  ना  जाओ

भारतियों जितना पड़ो पर वह इलाज ना कराओ

खैर  उनकी  छोड़ो  जैसी  उनकी  विश

पर  यहाँ  आते  तो  पता  चलता

चिकन   टिक्का  नहीं  हमारा  नेशनल  डिश

आते  है  वापस  अपने  जन्मभूमि  पर  जिसका  है  बुरा  हाल

सब  तरफ  तबाही  फैली  जाने  कैसे  बीतेगा  यह  साल

सब  के  सब  घूम  रहे  हुए  बदहवास

गन्दा  मैला  पानी  और  ले  रहे  पोल्यूटेड  श्वास

कहा  तक  बचोगे  किस  किस  से  बचोगे , कब  जागोगे

सुधरो  और  सुधारो , अपनी  गलतियों  से  कब  तक  भागोगे

कल  होगा  तो  ना  कुछ  और  कर  पाओगे

वरना  वक़्त  से  पहले  सब  धुल  हो  जाओगे

नहीं ,  गाँधी  जी  ने  नहीं   यह  सब  सोचा

पर  हम  भी   नहीं  सोच  रहे  यही   तो  है  लोचा

सपनो का मेला

काश मैं होती एक नदी
पीछे छूटते किनारे
कम होती मेरी धारा
ना करते मेरी आँखें  नम
                                       काश मैं  होती एक पर्वत
                                       मेरे तन पर होता प्रहार
                                       निर्वस्त्र हुआ मेरा अंग
                                       न शर्मसार करते मेरा जीवन
काश मैं होती आकाश
बादलों के बरसने के बाद
सुनसान रातों में
ना महसूस करती मैं खालीपन
                                      पर अगर मिला होता मुझे यह वरदान
                                      तो मैं कहलाती भगवान्
                                      इंसान हूँ
                                      लालच की पोटली हूँ
                                      उम्मीदों और निराशाओं से सजी एक रचना हूँ
                                      आने की ख़ुशी,
                                      जाने का गम
                                      सबको दिल में समाये
                                     अपने साँसों में पिरोए जीए जाऊँगी
                                     और एक दिन कुछ दिलो में
                                     कुछ यादें,कहानिया,हंसी और दुःख
                                     सब छोड़ इन्ही हवाओं में मिल जाउंगी

मेरे मन के सागर में

तुम पूछो तो मैं बोलू
कुछ राज़ मैं दिल के खोलू
कि कैसे तुम से पहले मन की तुम्हारी हवाएं मुझ तक पहुचाती है
कैसे तुम्हारे कदमो की आहट शाखें गा गा कर मुझे सुनाती है
कैसे बिन तुम फिरते है बादल सूखे से, जैसे कि हँसना भूल गए
कैसे बिन तुम पतझड़ अपनी हिम्मत खोने लगती है
तुम पूछो तो मैं बोलू
कुछ राज़ मैं दिल के खोलू
कि क्यों इस दिल की हर धड़कन सिर्फ गीत तुम्हारे  गाती है
क्यों बारिश कि हर बूँद जो मुझ पर गिरती है,लगता है तुमसे मिल कर आई है
क्यों यादों में मेरी बसे हो तुम, लिए खुशबू  इन्द्रधनुष के  हर रंग की
क्यों करती हूँ  तुम्हारी तस्वीरों से मैं इतनी बातें
तुम पूछो तो मैं बोलू
कुछ राज़ इस दिल के खोलू
कि  कैसे रात, तुम्हारे ख़्वाबों के आगोश में मुझको ले जाती है
कैसे  हर सुबह का सूरज तुम्हारा  नाम  लिए मुस्काती है
कैसे  चाय की हर चुस्की मन में जागती है एक प्यारा सा एहसास
कैसे  रस्ते की भीड़ मानो कहती है, आ मिल मुझमे हो सकता है वह दिख जाए
तुम पूछो तो मैं बोलू
कुछ राज़ इस दिल के खोलू

चौकीदार

 
 
गली गली घूम घूम कहता है चौकीदार
होशियार होशियार होशियार
 
वह जो सामने से आ रही है चीख
गिड़गिड़ाती, मांगती ज़िन्दगी की भीख
उन साँसों की आह सुन, बंद मत कर किवाड़
आगे बड़ हिम्मत जुटा,बहानों की मत ले आड़
 
गली गली घूम घूम कहता है चौकीदार
सुन पुकार सुन पुकार सुन पुकार
 
मौन रह कायर ना बन, कुछ तो बोल,
कब से सो रहा है तू ,जाग अब आँखों को खोल
ज़िन्दगी हो रही है तार तार
बोल किसका कर रहा तू इंतज़ार
 
गली गली घूम घूम कहता है चौकीदार
खोल द्वार खोल द्वार खोल द्वार
 
पीड़ित शर्मसार हो जी रहे नज़रे झुका
अन्याय चल रहा उजाले में सर उठा
उसको रोक, करने से और वार
हो तू अकेले या हो संग चार
 
गली गली घूम घूम कहता है चौकीदार
तेरी आज है दरकार है दरकार है दरकार
 
नया कोई गीत, गा नई एक धुन
शाख शाख पर खुशिया आज तू बुन
ला किसी जीवन में आज तू बहार
ना मान हार अब, कर प्रयास बार बार
 
गली गली घूम घूम कहता है चौकीदार
हो तैयार हो तैयार हो तैयार

बवाल पर सवाल

यह जो हम बात बात पर मंदिर मस्जिद करते है
भगवान् चुप है पर हम धर्म का डंका बजाये फिरते है
यह लकीर जो कहती  है ब्रह्मण ऊपर दलित नीचे
यह लकीर जो ना जीवन और ना मौत ने खीचे
यह जो तेरा धर्म -मेरा धर्म, तेरी जाति – मेरी जाति  की होती रहती है खीच तान
बात बात पर रोष बात बात पर अभिमान
कितने झगड़े कितने बवाल
इन सब में है मेरे कुछ  सवाल
अगर हम सब है अपनी अपनी धर्म जाती के पूर्वजो के वंशज
फिर आदि मानव हमारे सबसे पहले पूर्वज
इनकी जाति धर्म का कैसे करे पता?
और कैसे करे पता की यह पहले बने इंसान या हिन्दू  और  मुसलमान ?
या फिर इंसान बनने से पहले जाति की खीच दी गयी थी लकीर !
क्या इन्होने  पहले सीखा हल जोतना या धर्मो के बीच एक खाई  खोदना ?
क्या ये जंगल जंगल भटकते हुए भी कुछ को दलित मान उन्हें सारी नदियों से रखते  थे दूर ?
क्या सबसे पहले आग से, पका खाना और हुई दूर ठंड
या दूसरो की गुफाओ को जलाने के लिए इसका हुआ था आविष्कार ?
एक बार सब कुछ चल जाये पता तो चैन आये
फिर मैं भी धर्म जाति का यह खेल खेलू
शायद तब मुझे भी मज़ा आये

अन्ना अन्ना गली गली

अन्ना आज आज़ाद तिहाड़  से
कितने आज़ाद ?
यह वक़्त ही बताएगा
पर संघर्ष रुक गया
सोच थम गयी तो
कैसे जानेंगे हम
हम सब में है एक अन्ना
शायद कही ज्यादा ताकतवर
पर यह लौ जिसने जलाई
उस शक्ति को नमन
आग जलनी  चाहिए
पर जलाने के लिए नहीं
रौशनी के लिए
हवा कभी रुके नहीं
पर आंधी बन तबाही नहीं
ठंडी शांति और जागरूकता की
यह धारा थमे नहीं
पर बाढ़ बन उजाड़े नहीं
प्यास बुझाए अशांत मन की
सब सीखे अन्ना से
क्या सीखे अन्ना से
कैसे शान्ति धीरता
ईमान दारी
और अपने कर्म
और धर्म  के प्रति सच्चाई
से जीते हम कोई जंग
की सामने वाला  दोस्त या दुश्मन
अपना है जीतो उसको प्यार से
हार तब तक हार नहीं जब तक
हम माने  हार नहीं
की जीत में खुशी नहीं
अगर हो हम अकेले
की देश झंडे या राष्ट्र गीत से नहीं
हमसे है हमारे सोच और कर्मो से है
की इतनो को भेजा है
चलो अब सब गिले शिकवे कर दूर
भेजते है अपने देश को एक
फ्रेंड रेकुएस्ट
निभाते है अपनी दोस्ती को
उसकी सब खामियाँ और खूबियाँ
हम से है
चलो करते है
खुद से दोस्ती
सवारते है खुद को
की देश खिल उठेगा
की सजाते है
मानवता, सच्चाई, शिक्षा की रंगोली
बांधते है दोस्ती का एक अटूट बंधनवार
चलो भेजते है
अपने देश को एक फ्रेंड रेकुएस्ट
चल भाई …..
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