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एक बंगला बने न्यारा

कल बड़े दिनों बाद बाज़ार में मिले संकटा बाबू
मिलते ही उन्होंने ने कहा काम से गए थे आबू
मैंने पूछा कैसे है सर आज कल दिखते ही नहीं
कई दिनों से ब्लाग आपका सूना पड़ा कुछ लिखते भी नहीं
संकटा बाबू बोले कि क्या कहें  सिचुएशन  है काम्प्लेक्स
होम लोन ने मार रखा है मुश्किल में है मेरे सपनो का ड्यूप्लेक्स
लोगो को तो सिर्फ दिखता है जो भी उपरी मैंने  कमाया
सोचते होंगे मुझे क्या चिंता मैंने तो बहुत  होगा जमाया
जानते है ऊपर का पैसा कैसे नीचे दबा कर रखना पड़ता है
क्योकि यह आईटी वालो कि आँखों में यह बहुत  जल्द अड़ता  है
ऊपर से सारे गोरख धंदे वाले जिस गति से तिहाड़ भर रहे है
उसी डर से मेरे सारे ऐसे वैसे पैसे दीवान में सड़ रहे है
यही मनाता हूँ कि कही कोई बुला ना ले दिल्ली
सुना है अच्छे अच्छे शेर वहां  हो जाते है भीगी बिल्ली
बढते ई ऍम आई ने ऐसी बजा राखी है बैंड
घर पूरा करना हो तो मिलानी पड़ेगी  सीमेंट में और ज्यादा सैंड
गया था आबू कि कही से हो जाए कुछ जुगाड़
और  इस महंगाई की कुछ कम हो जाए दहाड़
पर लक्ष्मी जी भी आज कल किसी की नहीं सुन रहीं
बढते महंगाई से बचा सके लगता है ऐसी कोई धुन नहीं
संकटा बाबू की इतनी और ऐसी बातें सुन मैं रह गयी स्तब्ध
क्या कहू,सांत्वना दू या सलाह, नहीं मिल रहे थे शब्द
कमाई उपरी हो या सीधी सब का हो रखा है  बुरा हाल
आर्थिक मंदी का दौर बड़ा बुरा जा रहा है  यह साल
हम सब तो अब तक  यही सोचते थे संकटा बाबू के क्या ठाठ
पर लगता है कैसे भी कमाओ सरकार दे ही देती है सबको मात
इसी लिए इस धनतेरस पर लक्ष्मी जी कि की जम के पूजा
और कहा माता एक घर बन जाए इसी आमदनी में मांगू वरदान  ना दूजा
~सोमा मुखर्जी ( सोमकृत्य)
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