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एक अरज

कोई आंधी मुझे  क्या तोड़े

मेरे सपनो  में  हौसलों के रंग

बस इतना करम करे मेरा भगवान्

न आसमान से वफ़ा में हो कमी

और न ज़मीन को जफ़ा दे कदम

कॉपीराइट 2013 @सोमक्रित्य

सुबह की चुस्की

image courtsey Google

आज सुबह जब
अपनी पंखुड़ी खोले
तू भी उठ कर देख
~
देख की क्या नशा है
सुबह में आज
कैसे हवा नए रंग लिए
मस्त मगन हो डोल रही
कैसे कली नए पौशाख पहन
 खिलने को हो रही आतुर
कैसे पंछियों ने नए गीतों के
बांधे है नए बंधनवार
कैसे रात का बादल  सूरज की तेज़
से नहा रहा है आज
~~~~~
अरे उठ पगले
अम्मा आवाज दे दे कर थक गयी
नींद को पेड़ पर दे टांग
टहनी से कह
रात तक करे उसकी देखभाल
बंदरो से कह
कूद कूद करे रखे नींद को तैयार
कि जब थक जाए यह शरीर
तो आने में ना करे आज देर
तब तक इस नए सुबह कि चुस्कियों से
मन को कर तरो ताज़ा
आगे बढ़
और नए रास्तो से
आज कर पहचान
लिख गीत ऐसे
कि कल पंछी
उसी गीत से
करे सुबह का आव्हान

सपनो का मेला

काश मैं होती एक नदी
पीछे छूटते किनारे
कम होती मेरी धारा
ना करते मेरी आँखें  नम
                                       काश मैं  होती एक पर्वत
                                       मेरे तन पर होता प्रहार
                                       निर्वस्त्र हुआ मेरा अंग
                                       न शर्मसार करते मेरा जीवन
काश मैं होती आकाश
बादलों के बरसने के बाद
सुनसान रातों में
ना महसूस करती मैं खालीपन
                                      पर अगर मिला होता मुझे यह वरदान
                                      तो मैं कहलाती भगवान्
                                      इंसान हूँ
                                      लालच की पोटली हूँ
                                      उम्मीदों और निराशाओं से सजी एक रचना हूँ
                                      आने की ख़ुशी,
                                      जाने का गम
                                      सबको दिल में समाये
                                     अपने साँसों में पिरोए जीए जाऊँगी
                                     और एक दिन कुछ दिलो में
                                     कुछ यादें,कहानिया,हंसी और दुःख
                                     सब छोड़ इन्ही हवाओं में मिल जाउंगी

ऐ अम्मा

पोटली भर आस लिएँ दो आँखें
चल पडी थी जाने कहाँ
आज बस स्टाप के नीचे है बैठी
कल तक था  एक पेड के नीचे उसका ठांव
कहते है पता बताने वाले ने लिखा था सिर्फ राह का ही नाम
मन्जिल बताता तो यह पहुँच नही जाती?
अब बैठी है सडक पर आँखें बिछायें
जाने कब से जाने कब तक
बचपन मे अम्मा की कही बात याद आ गई
एक टोकरी मे सामान लाद कर जब वह बापू के पास जाने लगती
तो अम्मा  कहती- अरी लाडो एक टोकरी मे सब मत डाल
गिर गया तो सब एक साथ बिखर जाएगा
पर अम्मा की भी कोई सुनता है भला
वह वैसे ही भागती और जोर से कहती
हाँ हाँ अम्मा अगली बार
और हंस के निकल जाती
आई थी अम्मा कल रात सपने मे
बोली बहुत सह चुकी लाडो
आ, मेरे पास आजा, देख तो बाल कितने रूखे हो गए है
पर अम्मा की भी  कोई  सुनता है भला
सपने मे भी आस से भरी वो आँखें
फिर  जोर से बोली
हाँ हाँ अम्मा अगली बार ज़रा नाती को देख लू
पर जाने क्यों इस बार लाडो को हंसी नही आई
एक रोज बारिश मे कोई  पकडा गया एक पुरानी टूटी छत्री
तो पगली उसे अपना समझ कर बोली
तु क्यों नही जन्मा रे मेरी कोख से
कहाँ था अब तक, अरे भाग मत यहाँ आ
ऐसे ही जाने कितनी आँखें
जाने कितनी पोटली भर आस और आह लिए बैठी है
सोचती होगी आज तो ज़रूर आएगा कोई
और बोलेगा अरे अम्मा तू यहाँ?
कब से तलाश कर रह था तेरी
चल तेरा कमरा तैयार है
गरम खाना खा कर आराम कर
चल अम्मा
ऐ अम्मा, अम्मा, ऐ अम्मा
चारो तरफ भीड बस स्टाप के
सब आज बुला रहे है पर पोटली चुप
लगता है आज इन आँखो ने अम्मा की सुन ली
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