इसे कहानी कहिये या कविता
जो भी हो
होगी हपी एंडिंग वाली
इतना वादा करती हूँ
तो सुनिए ऐसा है कि ……
खुले आसमान में उड़ते पंछी को कहाँ पता होता है
कि उसकी किस उड़ान पर बहेलिये की नज़र टिकी हुई है
कहाँ पता होता है
कि कौन सी उड़ान उसकी आखिरी उड़ान होगी
कहाँ पता होता है की जिस आज़ादी पर

वह इतना इतराती गा रही है
वह यूं ही कभी भी उस से छीन ली जाएगी
और फिर एक दिन खुद को पिंजरे में बंद देख
कतराए पंखो पर चीखती चिल्लाती है
कोशिश करती है की किसी को तरस आ जाये
फिर धीरे धीरे हार कर
इसे ही अपनी दुनिया मान जीने लगती है
और कभी कोई पिंजरे से बाहर छोड़ भी दे
तो वापस अपने पिंजरे में लौट आती है
आदत भी कमाल की चीज़ है
फिर चाहे वह गुलामी की ही क्यों ना हो….
कुछ ऐसा ही कहानी है मिट्ठो की
पहले तो अपने घावो को छुपा लेती थी
इस डर से चुप चाप सब सह लेती थी
की उसकी छोटी सी गुडिया सुन ना ले
कही सब के सामने बात आ गयी तो
वह तो शर्म से मर ही जायेगी
कितना आजीब है हमारे समाज का रिवाज़
जिस पर जुल्म होता है वही शर्म से मूँह छुपाये फिरता है
और करने वाला गर्दन ऊची कर ऐसे घूमता रहता है
जैसे हाथ उठाना जानवरों की तरह पेश आना
उसका जन्म सिद्ध अधिकार है
और फिर एक दिन वह भी आया
जब जिस्म पर पड़े काले नीले निशानों को
शादी के अनगिनत सौगातो को
आँचल ने भी छुपाने से इनकार कर दिया
कुछ नहीं बदला
ना रात ने उसकी सिसकियो को छुपाया
ना सुबह ने अपने आगोश में लिया उसे
जानने वाले सब जान गए
पर कौन किसी और के मामले में पड़े
मिट्ठो के घर का मामला है वही सुलझाए
हाँ उसकी हालत पर दो चार दिन बात की
फिर बात व्यंग पर, हंसी मज़ाक पर पहुच गयी
कुछ ने तो यह भी कह दिया ताली एक हाथ से नहीं बजती
या फिर
मर्द तो ऐसे ही होते है हम औरतो को समझना चाहिए
कुछ ने उसे सुझाया की वह पुलिस से मदद मांगे
पर मिट्ठो ही नहीं मानी
कहा था ना पिंजरे की आदत बड़े कमाल की आदत होती है
मिट्ठो तो शायद ऐसे ही मार खा खा कर जी भी लेती
अगर उस दिन उसकी बेटी ने उसे देख नहीं लिया होता
जोर से रोने लगी और बोली पापा नहीं मम्मी को मत मारिये
मम्मी सॉरी बोलो ना
पापा तो अपने मर्दानगी और शराब के नशे में चूर
बेटी पर हाथ उठाने वाले ही थे की
मिट्ठो को जाने क्या हुआ
उठ खड़ी हुई और उस दरिन्दे का हाथ पकड़ लिया
और बोली
बस और नहीं… बस
बहुत हो गया
बेटी पर हाथ उठाया तो अच्छा नहीं होगा ….
जानते है यह दरिन्दे भी कमाल के डरपोक होते है
कभी दिल से आँखों में आँखें डाल दहाड़ कर देखिये
कैसे दुम दबा कर भागते है
अरे आपकी की खामोशी पर जो पलता है
उसे तो सिर्फ आपकी आवाज़ ही चुप करा सकती है ना
चलिए कहानी को थोड़ा छोटा कर आते है वर्तमान में
मिट्ठो आज एक स्कूल में पढाती है
स्वाबलंबी है
और सच मानिए
जैसे गुलामी एक आदत है
तो स्वाबलंबन एक नशा
खुली हवा का नशा
अपने फैसले लेने का नशा
सर उठा कर चलने का नशा
अपने पैरो पर चलने का नशा
और ऐसा ही एक नशा
मिट्ठो ने अपनी बेटी को भी दे दिया है
बड़ी होनहार है
और सबसे बड़ी बात
आज दोनों पंछी आज़ाद है
इस दुनिया में उड़ते फिरते है
और गाते है जीवन के मधुर गीत
क्यों कहाँ था ना हैपी एंडिंग होगी
होगी क्यों नहीं
मिट्ठो ने हिम्मत जो की
आप भी करिए
और इस बार सिर्फ अपनी बेटी के लिए नहीं
अपने लिए भी
एक हैपी शुरुआत के लिए
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